मिलिए Prime की स्थिर फैकल्टी से
JEE और NEET परिणामों के लिए एक दशक से साथ जुड़ी फैकल्टी टीम क्यों मायने रखती है।
स्थिर फैकल्टी टीम
जिन इंस्टीट्यूट्स में फैकल्टी स्थिर रहती है और पूरे कोर्स में वही शिक्षक पढ़ाते हैं, वहाँ के छात्रों को निरंतरता का फ़ायदा मिलता है। ऐसे इंस्टीट्यूट्स की JEE/NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दर आम तौर पर ज़्यादा होती है। Prime Academy इसका बेहतरीन उदाहरण है। Prime Academy की फैकल्टी करीबी दोस्तों की टीम है, जिनमें से कई IIT में हॉस्टल के दिनों से दोस्त हैं। यह पुराना रिश्ता सिर्फ़ पुरानी यादों तक सीमित नहीं है; यह बदलाव लाने वाला है। एक दशक से भी ज़्यादा समय से, साल-दर-साल, वे अपने जुनून को जीते हुए और अपने गहरे रिश्ते का आनंद लेते हुए Prime Academy के छात्रों को पढ़ा रहे हैं। आज Prime Academy भारत के शिक्षा जगत में, खासकर फैकल्टी की स्थिरता के मामले में, एक अनोखी मिसाल है। हमारी वेबसाइट के "फैकल्टी" सेक्शन में हम गर्व से अपनी फैकल्टी की दस साल से भी ज़्यादा पुरानी एक ग्रुप फ़ोटो दिखाते हैं, जो उनकी स्थायी प्रतिबद्धता और रिश्ते का प्रमाण है। यहाँ कुछ मुख्य बातें हैं, जो कोर्स के बीच में फैकल्टी के छोड़ जाने के नुकसानों की तुलना में स्थिर फैकल्टी टीम के फ़ायदों को रेखांकित करती हैं।
- सच्चे जुड़ाव की ताकत:
असली जादू तब होता है, जब शिक्षक पूरे कोर्स में लगातार जुड़े रहते हैं, अपने छात्रों से सच्चा रिश्ता बनाते हैं और उनकी खूबियों और कमज़ोरियों को समझते हैं। यह व्यक्तिगत जुड़ाव हर छात्र के हिसाब से मार्गदर्शन का रास्ता खोलता है, जो JEE/NEET जैसी परीक्षाओं में सफलता की संभावना कई गुना बढ़ा सकता है।
- भावनात्मक असर और रोल मॉडल:
कई छात्र अपने शिक्षकों को रोल मॉडल मानने लगते हैं। इसलिए जब ये शिक्षक बदलते हैं, तो छात्रों को बड़ा झटका लग सकता है, न सिर्फ़ पढ़ाई के स्तर पर बल्कि भावनात्मक रूप से भी।
- व्यक्तिगत जुड़ाव और मार्गदर्शन:
पढ़ाई के पूरे सफ़र में लगभग हर छात्र को किसी न किसी चुनौती का सामना करना पड़ता है, चाहे वह मॉक टेस्ट में कम स्कोर से आई निराशा हो, कुछ टॉपिक्स समझने में दिक्कत हो, समय का सही प्रबंधन न कर पाना हो, परीक्षा की घबराहट हो या किशोर उम्र के आम भटकाव। अगर छात्रों का अपने शिक्षकों से व्यक्तिगत जुड़ाव हो और वे इन मुद्दों पर खुलकर बात करें, तो उन्हें सबसे अच्छे स्रोत से अनमोल मार्गदर्शन मिल सकता है। यह तभी संभव है, जब ये शिक्षक पूरे कोर्स में उस छात्र से जुड़े रहें।
- बिना रुकावट पढ़ाई के लिए निरंतरता:
कल्पना कीजिए कि प्रतियोगी परीक्षा के लिए पढ़ाना ब्लॉक्स से कोई इमारत बनाने जैसा है। ढाँचा पूरा करने के लिए हर ब्लॉक (सब-टॉपिक) को ध्यान से बनाना और एक-दूसरे में फ़िट करना होता है। अगर एक शिक्षक बनाना शुरू करे और दूसरा उसकी जगह ले ले, तो नए शिक्षक को पहले वाले के बनाए ब्लॉक्स का इस्तेमाल करना पड़ता है। यह मुश्किल हो सकता है, क्योंकि हो सकता है वे दूसरे शिक्षक के बनाए नए ब्लॉक्स के साथ पूरी तरह फ़िट न हों। सबसे अच्छा यही है कि एक ही शिक्षक शुरू से अंत तक सारे ब्लॉक्स बनाए और जोड़े। इस तरह इमारत (यानी पढ़ाई) मज़बूत और साफ़ बनती है। फ़िज़िक्स पढ़ाने में सवाल हल करने का एक तरीका है, जिसे 'reduced mass approach' कहते हैं। कुछ शिक्षक इसे शुरुआत में ही, "Center of Mass" टॉपिक के दौरान पढ़ा देते हैं, जबकि कुछ "Gravitation" टॉपिक तक रुकते हैं। अब अगर कोई नया शिक्षक आता है, जो यह तरीका जल्दी पढ़ाना पसंद करता है, और उसे पता चलता है कि पिछले शिक्षक ने इसे "Center of Mass" में नहीं पढ़ाया, तो समस्या खड़ी हो जाती है। नए शिक्षक को पीछे जाकर इसे शुरू से पढ़ाना होगा। यानी कुछ पुराने टॉपिक्स फिर से दोहराने पड़ेंगे। यह आगे-पीछे का सिलसिला पढ़ाई की रफ़्तार धीमी कर सकता है और छात्रों से टॉपिक्स के बीच के अहम जुड़ाव भी छूट सकते हैं। पुणे के एक जाने-माने इंस्टीट्यूट का उदाहरण लीजिए। वहाँ एक शिक्षक "complex numbers" नाम का टॉपिक पढ़ा रहे थे। लेकिन तभी एक नए शिक्षक आने वाले थे। काम बाँटने के लिए टॉपिक को दो हिस्सों में बाँट दिया गया। पहले शिक्षक से पहला हिस्सा पढ़ाने को कहा गया, लेकिन ज्यामिति वाले भाग के बिना, जबकि "complex numbers" में ज्यामिति बेहद ज़रूरी है। ऐसा इसलिए नहीं था कि शिक्षक इसे पढ़ा नहीं सकते थे, बल्कि इसलिए कि दो शिक्षक शामिल होने के कारण कोचिंग इंस्टीट्यूट यह साफ़ रखना चाहता था कि कौन क्या पढ़ाएगा। नतीजा यह हुआ कि छात्रों को मुश्किल हुई। उन्होंने शायद सोचा कि टॉपिक ही कठिन है या उन्होंने पर्याप्त पढ़ाई नहीं की, यह समझे बिना कि उन्हें शुरू से ही पूरी तस्वीर दी ही नहीं गई थी। वहीं अगर स्थिर फैकल्टी होती, जिस पर पढ़ाने के क्रम की कोई पाबंदी न होती, तो वह इन टॉपिक्स को आसानी से और मज़े से पढ़ा सकती थी।
- तालमेल बैठाने का समय और पढ़ाई में देरी:
जब कोई नया शिक्षक आता है, तो छात्रों और शिक्षक को आपसी तालमेल बनाने में अक्सर समय लगता है, जो JEE की तैयारी के लिए बहुत ज़रूरी है। तालमेल बैठाने का यह समय पढ़ाई की प्रक्रिया में देरी कर सकता है, जिससे प्रतियोगिता में छात्र पिछड़ सकते हैं।
- लंबी प्रतिबद्धता और छात्रों की सफलता:
जब शिक्षकों का अपने इंस्टीट्यूट और छात्रों से लंबा रिश्ता होता है, तो वे अक्सर सिर्फ़ पाठ्यक्रम पूरा करने से कहीं आगे जाते हैं। उनकी प्रतिबद्धता सिर्फ़ टॉपिक्स पूरे करने तक सीमित नहीं होती; वे छात्रों को प्रेरित करने और उनका मार्गदर्शन करने में अतिरिक्त ऊर्जा लगाते हैं। अस्थायी या कम समय के लिए आए शिक्षकों का छात्रों से शायद ऐसा गहरा जुड़ाव न हो। उन्हें यह भी लग सकता है कि परीक्षा परिणाम आने तक वे किसी दूसरे इंस्टीट्यूट में होंगे और जिन छात्रों को उन्होंने पढ़ाया, उनसे उनका कोई नाता नहीं रहेगा। ऐसे शिक्षकों को न सफलता का श्रेय मिलता है और न असफलता का दोष, क्योंकि छात्रों के शैक्षणिक सफ़र में उनकी भूमिका अस्थायी थी। इसके विपरीत, लंबे समय से जुड़े फैकल्टी मेंबर यह उम्मीद रखते हैं कि छात्रों की सफलता के जश्न में वे भी शामिल होंगे, और यही अतिरिक्त प्रेरणा छात्रों की शैक्षणिक सफलता पर बड़ा असर डाल सकती है।
- इंस्टीट्यूट बदलने और छात्रों की पढ़ाई में रुकावट:
आखिरी लेकिन बेहद अहम बात, जब कोई शिक्षक छोड़कर दूसरे इंस्टीट्यूट में जाता है, तो वह नया इंस्टीट्यूट उन छात्रों को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर सकता है, जो उस शिक्षक को पसंद करते थे। इससे अक्सर दोनों इंस्टीट्यूट्स के बीच खींचतान शुरू हो जाती है, और कभी-कभी एक-दूसरे के खिलाफ़ नकारात्मक प्रचार तक होने लगता है। ऐसी स्थितियों में छात्र और माता-पिता उलझन और चिंता में पड़ जाते हैं। नए इंस्टीट्यूट में जाने से आर्थिक बोझ बढ़ सकता है और, इससे भी गंभीर बात, पढ़ाई की निरंतरता टूट सकती है। पहले भी ऐसे कई मामले हुए हैं, जो अख़बारों की सुर्खियाँ तक बने।
ज़ोरदार मार्केटिंग और गिने-चुने सफल छात्रों के प्रदर्शन के कारण, जो शायद कुल छात्रों का छोटा-सा हिस्सा ही हों, यह सच्चाई अक्सर भावी छात्रों से छिपी रह जाती है। और जिन्हें इसका नुकसान उठाना पड़ता है, वे आम तौर पर चुप ही रहते हैं।